Thursday 1 December 2016

ख़ुद में एक बच्चा जिन्दा रखिये : डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने किया बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की बाल पुस्तकों का लोकार्पण

आधुनिक दौर में बच्चों में अध्ययन के प्रति समर्पण के साथ-साथ रचनात्मकता होना भी बहुत जरूरी है। यह रचनात्मकता ही हमें जिज्ञासु बनाती है और संवेदनशीलता को बरकरार रखती है। इसके लिए हमारे भीतर का बचपन जिन्दा रहना चाहिए। उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से 8 नवम्बर, 2016 को को पुलकित सीनियर सैकण्डरी स्कूल, हनुमानगढ़  में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की चार बाल पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए कहीं। 

बोधि प्रकाशन, जयपुर द्वारा  प्रकाशित चारों पुस्तकों  हिन्दी बाल गीत-‘चिडिय़ा चहके गीत सुनाए’, शिशु गीत-‘रसगुल्ला’, बाल कहानियां-‘मित्र की मदद’ तथा राजस्थानी बाल गीत-‘दिवळो कोई जगावां’ के लोकार्पण अवसर पर उपस्थित विद्यार्थियों और स्कूली बच्चों से रूबरू होते हुए  निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि हमें मात्र रूटीनी गतिविधियाँ करके रोबोट नहीं बनना। किताबी पढ़ाई बहुत कुछ है लेकिन यह ही सब कुछ नहीं है। असली संसार तो इन किताबों से बाहर बसता है, जिसे कवि, लेखक और साहित्यकार अपने खूबसूरत शब्दों के माध्यम से पन्नों के दायरे में बाँधने की कोशिश करते हैं और हम सबसे रूबरू करवाते हैं। 

श्री कृष्ण कुमार यादव ने वर्तमान दौर में बच्चों के मन में चल रहे अन्तर्दन्द्धों और सपनों को बाहर लेन की बात कही। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर अक्सर देखते और पढ़ते हैं कि अमुक जगह पर किसी बच्चे ने फेल होने पर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है। पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ है। किसी बच्चे को खेल में, किसी को पेण्टिंग या ड्राइंग में तो किसी को संगीत आदि में रूचि होती है। हमें अपनी रूचियों को बढ़ावा देते हुए इसमें और आगे बढऩा चाहिए। 

श्री यादव ने कहा कि बाल साहित्यकार के रूप में दीनदयाल शर्मा ने तमाम खूबसूरत कृतियाँ रची हैं और इन रचनाओं में हमारा-आपका सभी का बचपन जीवंत होता है।  इनकी रचनाओं में सहजता है और बाल सुलभता है। बच्चों से संवाद करती इन बाल रचनाओं ने दीनदयाल शर्मा जी को सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई है। श्री यादव ने आशा व्यक्त की कि सेवानिवृत्त  होने के बाद दीनदयाल शर्मा बाल-साहित्य के लिए और भी समय निकल सकेंगें और उनके मार्गदर्शन में तमाम भावी बाल साहित्यकार भी पैदा होंगे। 

लोकार्पण के मौके पर पुस्तकों के रचनाकार दीनदयाल शर्मा ने लोकार्पित पुस्तकों से कुछ कविताएं भी सुनाईं। कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं एवं वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णकुमार यादव को माल्यार्पण करके श्रीफल भेंट किया गया तथा शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में स्कूल के प्रधानाचार्य राजेश मिढ़ा ने अतिथियों को धन्यवाद देते हुए आभार जताया। कार्यक्रम का संचालन  सुदर्शन सामरिया, जोधपुर ने किया। 


(प्रस्तुति - दीनदयाल शर्मा, संपादक -टाबर टोली, हनुमानगढ़, राजस्थान)

Wednesday 11 May 2016

बाल साहित्य विशेषांकों में एक और कदम ''ज्ञान विज्ञान बुलेटिन'' का

हाल ही में ज्ञान विज्ञान बुलेटिन का बाल साहित्य विशेषांक प्रकाशित हुआ है। इस अंक का विमोचन कौसानी में आयोजित राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में हुआ। बाल साहित्य के पुरोधा से लेकर युवा बाल साहित्यकारों के महत्वपूर्ण आलेख पत्रिका में शामिल किए गए हैं। इसमें डाॅ0 राष्ट्रबंधु, डाॅ0 हरिकृष्ण देवसरे, रमेश तैलंग, देवेंद्र मेवाड़ी, डाॅ0 दिविक रमेश, डाॅ0शकुंतला कालरा, डाॅ0 नागेश पांडेय ‘संजय’, अशोक सिंह सोलंकी, कुंवर प्रदीप निगम, डाॅ0 प्रभु चैधरी, रामआसरे गोयल, विमला जोशी ‘विभा’, सुषमा भंडारी, डाॅ0 मोहम्मद अरशद खान, जगदीश जोशी, मालती शर्मा ‘गोपिका’, मनोहर चमोली ‘मनु’, के महत्वपूर्ण आलेख इस अंक में शामिल हैं। 

इस अंक में बाल साहित्य की उपलब्धियों के साथ अपेक्षाओं पर भी महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। भविष्य का बाल साहित्य पर भी विमर्श पत्रिका में शामिल है। बाल साहित्य का विकास एवं संभावनाओं, बाल साहित्य में लोक साहित्य का योगदान, बाल साहित्य में पर्यावरण, बाल साहित्य अपेक्षा और उपेक्षा , बाल साहित्य और इंटरनेट, बाल साहित्य यथार्थ और कल्पना, बच्चों के लिए विज्ञान लेखन, बाल साहित्य में संभावनाएं, संचार माध्यम, बालक और बाल साहित्य, आंचलिकता और बाल साहित्य, हिन्दी बाल कविता उपलब्धियां और संभावनाएं तथा बाल साहित्य कैसा हो आदि पर विहंगम चर्चा की गई है।

इस अंक का संपादकीय कहता है कि बालसाहित्य के प्रचार-प्रसार में बालपत्रिकाओं-पुस्तकों की खरीद के प्रति उदासीनता को तोड़ने की आवश्यकता है। संपादकीय कहता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बनाए और बचाए रखने के लिए पुस्तकालयों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। संपादकीय बाल साहित्य को वैज्ञानिक सोच पर आधारित और बाल मनोविज्ञान आधारित होने की वकालत करता है। 

डाॅ0 हरिकृष्ण देवसरे का महत्वपूर्ण आलेख पत्रिका में शामिल किया गया है। वह लिखते हैं कि आज बालसाहित्य की घटिया पुस्तकें और आलोचनाएं उसके भविष्य के लिए कितनी विषैली हैं,यह सहज ही देखा जा सकता है। लोककथाओं की दुनिया में बच्चों को भटकाकर, झूठे कल्पनालोक की सैर कराकर और सदियों  पुराने जीवन मूल्यों की घुट्टी पिलाकर हम कब तक अपने को संतुष्ट मानकर बालसाहित्य के विकास का ढोल पीटते रहेंगे?

देवेन्द्र मेवाड़ी का आलेख कहता है कि बच्चे वही पढ़ेंगे जो उन्हें रोचक लगेगा और आसानी सेे उनकी समझ में आएगा। अगर उसे पढ़ने में आनंद नहीं आएगा और वे उसे सहज रूप से समझ नहीं पाएंगे तो उस किताब या पत्र पत्रिका के बंद करके अलग रख देंगे। आलेख आगे कहता है कि आज बच्चों कको विज्ञान की तर्क संगत कहानी चाहिए जो उसे कल्पना लोक में भी ले जाए औैर उसे यह भी लगे कि हां ऐसा हो सकता है। ऐसी कहानी, जिस पर वे विश्वास कर सकें जो उनके अपने ज्ञान के तर्क पर सही साबित हो सके। 

रमेश तैलंग का आलेख कहता है कि हिंदी बाल कविता ने अपनी लगभग डेढ़ सौ वर्षों की अनवरत यात्रा में कथ्य,शिल्प और प्रयोग की दृष्टि से अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं और नई संभावनाओं के भी नए गवाक्ष खोले हैं । आलेख कहता है कि बाल कविता की आत्मा सूचना में नहीं संवेदना में बसती है। अनुभवों में नहीं अनुभूतियों में रसती है। 

दिविक रमेश का आलेख कहता है कि आज हिंदी के बालसाहित्य का इतिहास भी बहुत अनजाना नहीं रह गया है। हालांकि हिन्दी में उत्कृष्ट बाल साहित्य है लेकिन उसकी उपेक्षा क्यों? अब तो लिखने वाले भी बहुत हैं। लिखा भी बहुत जा रहा है। किसी भी महत्वपूर्ण वस्तु की उपेक्षा या तो नासमझी में की जाती है या उसे कमतर समझते हुए जानबुझकार। हिंदी का बाल साहित्य इन दोनों  का ही शिकार है।

डाॅ0 मोहम्मद अरशद खान का आलेख कहता है कि बदलती परिस्थितियां और तकनीकी विकास के दौर में भी बाल साहित्य और बाल पत्रिकाओं की सार्थकता बनी रहेगी। उसका रूप भले ही बदल जाए। आलेख इशारा करता है कि बच्चे सोने के अतिरिक्त अन्य किसी भी क्रिया टी0वी0 के सामने अपना अधिक समय बिताते हैं। आलेख संचार माध्यम,बालक और बालसाहित्य पर बहुत सारे मुद्दे केेंद्रित करता है।

जगदीश जोशी का आलेख कहता है कि हमारे क्षेत्र में जो भी बाल गीत,बाल कथाएं एवं बच्चों से संबंधित साहित्य बिखरा पड़ा है उसे संकलन करने की योजना बनायी जानी चाहिए।

सुषमा भंडारी का आलेख कहता है कि आज के युग में बच्चे यथार्थ से जुड़ना चाहते हैं इसलिए केवल काल्पनिक काल्पनिक बातों पर विश्वास नहीं करते। इसलिए साहित्य में कल्पना का पुट सिर्फ रूचि पैदा करने के लिए होना चाहिए। यथार्थ की नींव पर कल्पनाओं का समावेश करके साहित्य गढ़ा जाए तो बच्चे अवश्य रूचि लेंगे।

कुंवर प्रदीप निगम का आलेख जोर देते हुए कहता है कि आज का बाल साहित्य बच्चों के शिष्ट, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य नागरिक बनाने में योगदान कर रहा है। आलेख आगे कहता है कि बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन,उत्कंठित, प्रेरक,जिज्ञासापूर्ण तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सारगर्भित हो जो राष्ट्र निर्माण में भी सहायक बन सके। 

डाॅ0 प्रभु चौधरी  का आलेख कहता है कि बाल साहित्य की भाषा गूढ़ नहीं बल्कि सीधी सरल जो सहज समझ में आ सके ऐसी होनी चाहिए। शब्दावली भी ऐसी हा जो बच्चों को स्वयं अर्थ प्रदान करती चले। आलेख आगे कहता है कि हमारे सामने लक्ष्य होना चाहिए कि जीवन की दृृष्टि से हम बाल को इस प्रकार से चले किक कहीं से भी वह कुंठित न हो। उसकी प्रतिभा का दोहन न हो। 

रामआसरे गोयल का आलेख कहता है कि लोकसाहित्य को बड़ों से सुनकर ही हर बचपन बड़ा हुआ है। लोकसाहित्य को आधार बनाकर ही साहित्यकार बालसाहित्य रचता है। लोक साहित्य ही बालसाहित्य की नींव की ईंट है। ध्यान देने योग्य बात है कि बच्चों के लिए साहित्य सर्जना करते समय बचपन की डोर को पुनः थामना होगा। उनकी नटखट शरारतें,तोेतली बोली,किशोरों की ऊहापोहपरक स्थिति को ध्यान में रखकर ही बालसाहित्य की रचना हो। 

विमला जोशी ‘विभा’ का आलेख कहता है कि आज जहां हम बालसाहित्य में मनोरंजन,वैज्ञानिक सोच व वैचारिक खुलेपन की बात करते हैं वहीं हमें गिरते नैतिक मूल्यों हमारी संस्कृति हमारी विरासत और पर्यावरण के प्रति भी चिंतनशील होकर बाल सुलभ मनोभाव को ध्यान में रखते हुए अपनी कलम चलानी होगी।
डाॅ0 नागेश पांडेय ‘संजय’ का आलेख कहता है कि इंटरनेट पर बाल साहित्य नितांत अपेक्षित है किंतु बालकों से इसका जुड़ाव अभिभावकों के संरक्षण में ही होना चाहिए। लेख कहता है कि इंटरनेट पर आत्मतुष्टि के लिए लिखी गई रचनाएं आज के जागरूक बच्चे के मन में बालसाहित्य के प्रति अरूरिच ही उत्पन्न कर रही है। इस अंक में राष्ट्रबंधु पर एक संस्मरण है। साथ ही राष्ट्रबंधु जी की एक बाल कहानी भी प्रकाशित है।

पिछले कई सालों से भारत ज्ञान विज्ञान समिति,उत्तराखण्ड का मुखपत्र नवंबर में बाल साहित्य विशेषांक प्रकाशित ही नहीं कर रहा है, उसका भरपूर स्वागत भी किया जाता है। लेकिन इस बार जून माह में ही इस मासिक बुलेटिन का बालसाहित्य विशेषांक देखकर अपार प्रसन्नता हुई। 40 पृष्ठ वह भी संपूर्ण ए फोर साइज के आवरण मुख भीतर व बाहर सहित कुल चार पेज को रंगीन देखकर अलग ही अनुभूति होती है। हमेशा की तरह इस बुलेटिन में एक-एक पेज पर पठनीय सामग्री पाठकों के लिए रखी गई है। इस अंक के साथ बुलेटिन अपने साढ़े ग्यारह साल पूर्ण कर चुका है। 

पत्रिका: ज्ञान विज्ञान बुलेटिन ( मासिक)/ संपादक: उदय किरौला/प्रकाशक: भारत ज्ञान विज्ञान समिति, उत्तराखण्ड/पृष्ठ संख्या: 40/ मूल्य: 5 रुपए
समीक्षक: मनोहर चमोली पोस्ट बाक्स 23 पौड़ी, उत्तराखंड

Thursday 24 December 2015

मुझे अपना दोस्त बना लो

आदिल के घर के पड़ोस में शर्मा अंकल रहते थे. उनका घर बहुत बड़ा था. बच्चे उनसे बहुत डरते थे. क्योंकि उनकी बड़ी बड़ी मूंछे थी जिसके कारण वो डरावने दिखते थे. उनका चेहरा हमेशा गुस्से में रहते थे. अंकल के अलावा उस घर में कोई ओर रहता था तो वो था रमेश भईया. वो अंकल के घर का सारा काम करते थे. उसे अंकल ने बोल रखा था कि बच्चे इस घर के आसपास दिखने नही चाहिए और अगर दिखे तो उसकी नौकरी चली जाएगी. इस कारण भईया बच्चों को उस मकान के आसपास फटकने नही देते थे. बच्चे अंकल के घर के बाजू के मैदान में क्रिकेट खेलते थे तो कई बार उनकी गेंद चली जाती थी. जिस भी बच्चे की वजह से गेंद अंकल के घर जाती थी उसी बच्चे को जाकर गेंद लानी पड़ती थी. पहले पहल तो बच्चों ने एक दो बार उस घर में जाकर गेंद मांगने की कोशिश भी की लेकिन गेंद तो नही मिली, हाँ अंकल से खूब सारी डाट जरुर मिली और उन्हें भगा दिया गया. उसके बाद से यह होने लगा कि जिस बच्चे की वजह से गेंद अंकल के घर जाती थी वो नयी गेंद खरीद कर ग्रुप में दे देता था. 

इस बार यह गलती आदिल से हो गयी. क्रिकेट खेलते समय जोश जोश में उसने एक लॉन्ग शोर्ट मार दी और गेंद सनसनाती हुई अंकल के घर जा गिरी. आदिल ने सोचा ‘अगर वो नयी गेंद के लिए अम्मी से पैसे मांगेगा तो वो गुस्सा करेगीं.’ आदिल के अब्बा ऑटो चलाते थे, लेकिन उनकी कमाई इतनी कम होती थी कि घर का खर्च बड़ी मुश्किल से हो पाता था, आदिल और उसके भाई बहन को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए आदिल की अम्मी भी घर में सिलाई का काम करती थी. आदिल की समझ में नही आ रहा था कि क्या करे. उसने सोचा ‘गेंद के लिए एक बार रमेश भैया से बात करता हूँ’. बड़ी हिम्मत करके वह अंकल के घर गया. शर्मा अंकल के बगीचे में बहुत सारे पेड़ लगे थे. वो रमेश भैया को धीरे से आवाज लगाने लगा, तभी उसे अपनी गेंद झाड़ी के पास दिखाई दे गयी, उसने राहत की सांस ली. गेंद लेकर जाने लगा तो उसे उसी झाड़ी में फंसी कुछ काली चीज दिखाई दी, हाथ बढ़ा कर उठाया तो पाया कि यह तो एक पर्स है, उसने पर्स को खोलकर देखा, उसमें बहुत सारे पैसे रखे थे. पर्स पर अंकल की तस्वीर थी. उसने पहले सोचा कि ‘पर्स अंकल को वापस कर देता हूँ,’ लेकिन फिर सोचा ‘उसे गेंद तो मिल गयी है पर्स यही छोड़ कर चुपचाप निकल जाता हूँ.अगर अंकल को जा कर पर्स दूगां तो वो मुझे अपने घर आया देख खूब डांटेगें,’ रमेश भईया पर्स को खोज लेगे,’ और उसने पर्स वही रखा, लेकिन उसे लगा वह ठीक नही कर रहा है, ‘अंकल भले ही उसे कितना भी डांटे, पर्स उन्हें दे देता हूँ, उसमें कितने सारे पैसे है, हो सकता है उन्होंने कुछ जरुरी काम के लिए इतने सारे पैसे निकाले होंगे.’ उसने पर्स उठाया और डरते डरते घर की घंटी बजायी, अंकल ने दरवाजा खोला, वो बहुत परेशांन लग रहे थे, आदिल कुछ कह पाता उससे पहले ही अंकल उसे डांटने लगे “तुम लोगों को कितनी बार कहा है यहाँ मत आया करो, लेकिन तुम लोग सुनते नही हो,भागो यहाँ से नही तो तुम्हारे घर में शिकायत करवाऊँगा.” और वो दरवाजा बंद करने लगे, आदिल ने कहा “अंकल एक मिनिट मेरी बात तो सुनिए,मेरी गेंद आपके बगीचे में आ गयी थी, मैं उसे लेने आया था तो वहां झाड़ी में ये पर्स मिला, इसमें बहुत सारे पैसे है, आपके गुस्से के डर से पहले सोचा कि इसे वही छोड़ कर चला जाता हूँ, लेकिन बाद में सोचा कि आप पर्स के लिए परेशांन हो रहे होगें, आप डांटेगें तो मैं डांट चुपचाप सुन लूंगा, ये पर्स ले लीजिये और मुझे माफ़ कर दीजिये, आगे से कभी आपके घर नही आऊँगा.” और आदिल अंकल को पर्स पकड़ा कर तेजी से भाग गया. 

दूसरे दिन जब सारे बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे तो रमेश भैया आते दिखाई दिए, अशोक ने आदिल से कहा ‘तुम्हे कल अंकल के घर नही जाना चाहिए था पता नही आज क्या समस्या हो गयी जो भईया को भेजा है,’ आदिल घबरा गया रमेश भैया ने पास आ कर कहा “तुम सभी बच्चों को अंकल बुला रहे हैं,” बच्चे बड़े हैरान हुए, ये पहली बार था कि अंकल खुद से उन सब को बुला रहे हैं. बच्चों ने सोचा कल की वजह से अंकल सब को बुला कर डांटने वाले हैं. सभी ने एक स्वर में जाने से मना कर दिया, तब रमेश भैया ने कहा “अरे डरो मत वो तुम लोगों को डांटेगें नही, बल्कि बात करने बुला रहे हैं,” सभी बच्चे घबराते हुए अंकल के घर पहुचें, वहां टेबल पर ढेर सारी खाने की चीज रखी थी,अंकल ने सभी बच्चों को प्यार से बैठाया और कहा “आदिल कल मैंने तुम्हे खूब डांटा,मुझे माफ़ कर दो, मैंने तुम सभी बच्चों के साथ हमेशा बुरा व्यवहार किया, इसके लिए सभी से माफ़ी मांगता हूँ, क्या तुम लोग मुझे माफ़ करके अपना दोस्त बनाओगे?” सब बच्चों ने एक दूसरे की ओर देखा और एक साथ बोला “हाँ आज से आप हमारे दोस्त हुए”. और सारे बच्चे मेज पर रखी खाने की चीज पर टूट पड़े. अंकल दूर खड़े बच्चों के भोलेपन को प्यार से देख रहे थे. 

-उपासना बेहार
भोपाल (मध्य प्रदेश)
upasana2006@gmail.com

Tuesday 14 October 2014

'स्वच्छ भारत' को लेकर बच्चों ने बनाया डाक टिकट

 'स्वच्छ भारत' की संकल्पना को लेकर राष्ट्रीय डाक सप्ताह दौरान आयोजित फिलेटली दिवस पर स्कूली बच्चों ने  डाक टिकट बनाया। इलाहाबाद में 13 अक्टूबर, 2014 को आयोजित इस कार्यक्रम में बच्चों ने 'स्वच्छ भारत' के प्रति अपनी भावनाओं को खूबसूरत चित्रों में ढालते हुए भिन्न-भिन्न रंग भरे।  रंग भी इतने करीने से कि स्वच्छ्ता का अहसास करायें।  किसी ने भारत का नक्शा बनाकर तो किसी ने बापू जी माध्यम से स्वच्छ्ता का सन्देश दिया। इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  इसका उद्देश्य डाक-टिकट संग्रह के प्रति बच्चों में अभिरूचि विकसित करना और डाक टिकटों के माध्यम से युवा पीढी को डाक सेवाओं के इतिहास से जोड़ते हुए 'राष्ट्रीय स्वच्छ्ता अभियान' से जोड़ना था।


(राष्ट्रीय बालश्री विजेता एलिस अंशु फिलिप को पुरस्कृत करते निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव)


डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने डाक टिकट डिजायन प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया। इनमें सीनियर वर्ग में सेंट एंथनी गर्ल्स  कान्वेंट की छात्रा एवं राष्ट्रीय बाल-श्री विजेता एलिस अंशु फिलिप ने प्रथम, श्रेया डे ने द्वितीय तथा ज्वाला देवी विद्या मंदिर के आशीष कुमार यादव को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। जूनियर वर्ग में ज्वाला देवी विद्या मंदिर के ईशू सेठ व प्रखर खरे ने क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया।  

Wednesday 10 September 2014

है न अजूबा : अब डाक टिकट पर हो सकती है आपकी फोटो


डाक टिकट पर अभी तक आपने गांँधी, नेहरू या ऐसे ही किसी महान विभूति की फोटो देखी होगी। पर अब डाक टिकट पर आप की फोटो भी हो सकती है और ऐसा संभव है डाक विभाग की ’’माई स्टैम्प’’ सेवा के तहत। 


वाराणसी  में 6 सितम्बर, 2014 को माई स्टैम्प सेवा का उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में यह सेवा लखनऊ, आगरा व फतेहपुर सीकरी में उपलब्ध है और अब वाराणसी में। उन्होंने कहा कि माई स्टैम्प की थीम फिलहाल आकर्षक पर्यटन स्थलों पर आधारित रखी गई है। माई स्टैम्प फिलहाल 10 थीम के साथ उपलब्ध है, जिनमें-ग्रीटिंग्स, ताजमहल, लालकिला, कुतुब मीनार, हवा महल, मैसूर पैलेस, फेयरी क्वीन, पोर्ट ब्लेयर द्वीप, अजन्ता की गुफाएँं एवं सेंट फ्रांसिस चर्च शामिल हैं। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि माई स्टैम्प सेवा का लाभ उठाने के लिए एक फार्म भरकर उसके साथ अपनी फोटो और रूपय 300/- जमा करने होते हैं। एक शीट में कुल 12 डाक-टिकटों के साथ फोटो लगाई जा सकती है। इसके लिए आप अपनी अच्छी तस्वीर डाक विभाग को दे सकते हैं, जो उसे स्कैन करके आपकी खूबसूरत डाक-टिकट बना देगा। श्री यादव ने कहा कि यदि कोई तत्काल भी फोटो खिंचवाना चाहे तो उसके लिए भी प्रबंध किया गया है। पाँंच रुपए के डाक-टिकट, जिस पर आपकी तस्वीर होगी, वह देशभर में कहीं भी भेजी जा सकती है। इस पर सिर्फ जीवित व्यक्तियों की ही तस्वीर लगाई जा सकती है। 



डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने इसके व्यावहारिक पहलुओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि किसी को उपहार देने का इससे नायब तरीका शायद ही हो। इसके लिए जेब भी ज्यादा नहीं ढीली करनी पड़ेगी, मात्र 300 रूपये में 12 डाक-टिकटों के साथ आपकी खूबसूरत तस्वीर। अब आप इसे चाहें अपने परिवारजनों को दें, मित्रों को या फिर अपने किसी करीबी को। यही नहीं अपनी राशि के अनुरूप भी डाक-टिकट पसंद कर उस पर अपनी फोटो लगवा सकते हैं। आप किसी से बेशुमार प्यार करते हैं, तो इस प्यार को बेशुमार दिखाने का भी मौका है। 
         
माई स्टैम्प स्कीम के आरंभ के बारे में बताते हुए निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दुनिया के कुछेक देशों में माई स्टाम्प सुविधा पहले से ही लागू है, पर भारत में इसका प्रचलन नया है। वर्ष 2011 में नई दिल्ली में विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी (12-18 फरवरी 2011) के आयोजन के दौरान इसे औपचारिक रूप से लांच किया गया। उसके बाद इसे अन्य प्रमुख शहरों में भी जारी किया गया और लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। नतीजन देखते ही देखते हजारों लोगों ने डाक टिकटों के साथ अपनी तस्वीर लगाकर इसका लुत्फ उठाया। इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे अब वाराणसी में भी आरंभ किया जा रहा है।  





Monday 8 September 2014

गणतंत्र दिवस-2015 पर डाक टिकट के रूप में जारी हो सकता है आपका बनाया चित्र

हर किसी की चाहत होती है कि उसका बनाया चित्र डाक टिकट पर एक धरोहर के रूप में अंकित हो। भारतीय डाक विभाग ऐसे लोगों के लिए एक सुनहरा मौका लेकर आया है, जहाँ डाक टिकट पर आप द्वारा बनाया मौलिक चित्र स्थान पा सकता है। 

इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि आगामी गणतंत्र दिवस-2015 के लिए डाक विभाग ने ’स्वच्छ भारत’ थीम पर डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता की घोषणा की है, जिसके तहत कोई भी भारतीय नागरिक इस विषय पर डाक टिकट व अन्य फिलेटेलिक सामग्री हेतु अपना मौलिक डिजाइन भेज सकता है। 

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि यह डिजाइन इंक, वाटर व आयल कलर इत्यादि में हो सकती है, पर कम्प्यूटर प्रिन्टेंड/प्रिंट आउट की अनुमति नहीं होगी। डिजाइन के पीछे प्रतिभागी का नाम, उम्र, राष्ट्रीयता, पिन कोड के साथ आवासीय पता, फोन/मोबाइल नं0 व ई-मेल लिखा होना चाहिए। इसके साथ ही मौलिकता का एक घोषणपत्र भी संलग्न करना होगा। संबंधित प्रतिभागी स्पीड पोस्ट के माध्यम से 15 अक्टूबर 2014 तक अपनी प्रविष्टियाँ सहायक महानिदेशक (फिलेटली), कक्ष संख्या 108 (बी), डाक भवन, पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली-110001 पर भेज सकते हैं। स्पीड पोस्ट लिफाफे के ऊपर ’’गणतंत्र दिवस 2015-डाक टिकट डिजायन प्रतियोगिता’’ अवश्य अंकित होना चाहिए।

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक टिकट डिजाइन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6000 व 4000 रूपये का प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार भी दिया जायेगा।

Sunday 7 September 2014

शिक्षक दिवस के बहाने बाल-मन से रूबरू हुए प्रधानमंत्री मोदी

शिक्षक दिवस पर पहली बार हुआ कि देश के प्रधानमंत्री ने स्कूली बच्चों को सम्बोधित किया हो। देशभर के बच्चों के साथ संवाद के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह मेरे लिए एक सौभाग्‍य की घड़ी है, कि मुझे उन बालकों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला है, जिनकी आंखों में भारत के भावी सपने सवार हैं, मगर धीरे-धीरे इस प्रेरक प्रसंग की अहमियत कम होती जा रही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि शायद, बहुत सारे ऐसे स्‍कूल होंगे, जहां 5 सितंबर को याद भी नहीं किया जाता होगा, शिक्षकों को अवार्ड मिलना, उनका समारोह होना, यह ज्‍यादातर वहीं तक ही सीमित हो गया है। उन्होंने कहा कि आवश्‍यकता है कि हम इस बात को उजागर करें कि समाजिक जीवन में शिक्षक का महात्‍म्‍य क्‍या है और जब तक हम उस महात्‍म्‍य को स्‍वीकार नहीं करेंगे, न उस शिक्षक के प्रति गौरव पैदा होगा, न शिक्षक के माध्‍यम से नई पीढ़ी में परिवर्तन में कोई ज्‍यादा सफलता प्राप्त होगी, इस एक महान परंपरा को समयानुकूल परिवर्तन करके उसे अधिक प्राणवान एवं और अधिक तेजस्‍वी कैसे बनाया जाए इस पर एक चिंतन बहस होने की आवश्‍यकता है। प्रधानमंत्री ने सवाल उछाला कि क्‍या कारण है कि बहुत ही सामर्थ्यवान विद्यार्थी, टीचर बनना पसंद क्‍यों नहीं करते? इस सवाल का जवाब हम सबको खोजना होगा। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक वैश्विक परिवेश में ऐसा माना जाता है कि सारी दुनिया में अच्‍छे टीचरों की बहुत बड़ी मांग है, अच्‍छे टीचर मिल नहीं रहे हैं, भारत एक युवा देश है, क्‍या भारत यह सपना नहीं दे सकता कि हम देश से उत्‍तम प्रकार के टीचर्स एक्‍सपोर्ट करेंगे? आज जो बालक हैं, उनके मन में हम यह इच्‍छा नहीं जगा सकते कि मैं भी एक अच्‍छा टीचर बनकर देश और समाज के लिए काम आऊंगा, ये भाव कैसे जगे? प्रधानमंत्री ने कहा कि डॉ सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन ने इस देश की उत्‍तम सेवा की है, वह अपना जन्‍मदिन नहीं मनाते थे, व‍ह शिक्षक का जन्‍म दिन मनाने का आग्रह करते थे, ये शिक्षक दिवस की कल्‍पना ऐसे पैदा हुई है, खैर अब तो दुनिया के कई देशों में इस परंपरा को जन्‍म मिला है। उन्होंने कहा किदुनिया में किसी भी बड़े व्‍यक्ति से पूछिए, अपने जीवन में सफलता के बारे में वह दो बातें अवश्‍य बताएगा, एक कहेगा कि मेरी मां का योगदान है और दूसरी कहेगा कि मेरे शिक्षक का योगदान है, करीब-करीब सभी महापुरूषों के जीवन में ये बात हमें सुनने को मिलती हैं, लेकिन क्या हम जहां हैं, वहां यही बात हम सजगतापूर्वक करने का प्रयास करते हैं? 

नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक जमाने में शिक्षक के प्रति ऐसा भाव था कि गांव में सबसे आदरणीय कोई व्‍यक्ति हुआ करता था, तो वह शिक्षक हुआ करता था-‘नहीं मास्‍टर जी ने बता दिया है, मास्‍टर जी ने कह दिया है, ऐसा एक भाव था’ धीरे-धीरे स्थिति काफी बदल गई है, उस स्थिति को हम पुन: प्रतिस्‍थापित कर सकते हैं। उन्होंने बच्चों से कहा कि एक बालक के नाते आपके मन में काफी सवाल होगें, आपमें से कई बालक ऐसे होंगे, जिनको छुट्टी के दिन परेशानी होती होगी कि सोमवार कैसे आए और संडे को हमने क्‍या-क्‍या किया, जिसे स्कूल जाकर टीचर को बताऊंगा, जो अपनी मां को नहीं बता सकता, अपने भाई-बहन को नहीं बता सकता, वो बात अपने टीचर को बताने के लिए वह इतना लालायित रहता है, उसको टीचर से इतना आपनापन हो जाता है, कि वही उसके जीवन को बदलता है, फिर उसका शब्‍द उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाता है। उन्होंने कहा कि मैंने कई ऐसे विद्यार्थी देखें हैं, जो बात भी ऐसे बनाएंगे, जैसे उसका टीचर बनाता है, कपड़े भी ऐसे पहनेंगे जैसे उनका टीचर पहनता है, वो उनका हीरो होता है, ये जो अवस्‍था है, उस अवस्‍था को जितना हम प्राणवान बनाएंगे, उतनी ही अच्छी हमारी नई पीढ़ी तैयार होगी। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि चीन में एक कहावत है कि जो लोग साल का सोचते हैं, वो अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं, वो फलों के वृक्ष बोते हैं, लेकिन जो पीढ़ियों को सोचते हैं वो इंसान बोते हैं, मतलब उसको शिक्षित करना, संस्‍कारित करना उसके जीवन को तैयार करना, हमारी शिक्षा प्रणाली को जीवन निर्माण के साथ कैसे हम जीवंत बनाएं ये सोचना और करना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मैंने 15 अगस्‍त को एक बात कही थी, कि मेरी इच्‍छा है कि हमारे देश में इस वर्ष जितने स्‍कूल हैं, उनमें कोई स्‍कूल ऐसा न हो, जिसमें बालिकाओं के लिए अलग टायलेट न हो, आज कई स्‍कूल ऐसे हैं, जहां बालिकाओं के लिए अलग टायलेट नहीं हैं, कुछ स्‍कूल ऐसे भी हैं, जहां बालक के लिए भी नहीं और बालिका के लिए भी टायलेट नहीं है, अब यूं तो लगेगा कि ये भी कोई काम है कि जो प्रधानमंत्री के लिये महत्वपूर्ण है, लेकिन जब मैं डिटेल में गया तो मुझे लगा कि यह बड़ा महत्‍वपूर्ण काम है, करने जैसा काम है, लेकिन देशभर के जो भी टीचर मुझे सुन रहे हैं, उनसे मुझे हर स्‍कूल में मदद चाहिए, इसके लिए एक माहौल बनना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि मैं अभी जापान गया था, वहां एक भारतीय परिवार मुझसे मिला, लेकिन उनकी पत्‍नी जापानी है, पतिदेव इंडियन हैं वो मेरे पास आकर बोले कि एक बात करनी है, मैंने कहा बताओ, बोले कि आपका 15 अगस्‍त का भाषण भी सुना था, आप जो साफ-सफाई पर बड़ा आग्रह कर रहे हैं, हमारे यहां नियम है कि जापान में हम सभी टीचर और स्‍टूडेंट मिलकर के स्‍कूल में सफाई करते हैं, टायलेट वगैरह की सब मिलकर सफाई करते हैं, हमारे स्‍कूल में ये हमारे चरित्र निर्माण का एक हिस्‍सा है, आप हिंदुस्‍तान में ऐसा क्‍यों नहीं कर सकते हैं? मैंने कहा कि मुझे जाकर मीडिया वालों से पूछना पड़ेगा, वरना इसका उलटा 24 घंटे चल पड़ता है, क्‍योंकि मैंने एक दिन ऐसा देखा था, जब मैं गुजरात में था तो टीवी पर समाचार आ रहा था और समाचार ये था कि गुजरात में बच्‍चे स्‍कूल में सफाई करते हैं और क्या तूफान खड़ा कर दिया था ये कैसा स्‍कूल हैं?, ये कैसा मैनेजमेंट है? ये कैसे टीचर हैं? बच्‍चों का दमन करते हैं, मैने उस दिन टीवी पर ये सब कुछ देखा था, लेकिन हम इसको एक राष्‍ट्रीय चरित्र कैसे बनाएं? ये बन सकता है और इसे बनाया जा सकता है। 

प्रधानमंत्री ने देश के गणमान्‍य लोगों से आग्रह करते हुए कहा कि वे डाक्‍टर बने होंगे, व‍कील बने होंगे, इंजीनियर बने होंगे, आईएएस अफसर बने होंगे, आईपीएस अफसर बने होंगे, बहुत कुछ होंगे, मगर क्‍या आप अपने निकट का कोई स्‍कूल पसंद करके सप्‍ताह में एक पीरियड, उन बच्‍चे को पढ़ाने का काम कर सकते हैं? स्‍कूल के साथ बैठ करके आप विषय तय करें, आप कितने ही पढ़े-लिखे या बड़े अफसर क्‍यों न हों, सप्‍ताह में पास के स्कूल जाकर एक पीरियड बच्‍चों के साथ बिताएं, उनको कुछ सिखाएं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में कहीं कोई शिकायत है कि अच्‍छे टीचर नहीं हैं, ये फलाना नहीं है, ढिकाना नहीं है, इसको ठीक किया जा सकता है, हम राष्‍ट्र निमार्ण को एक जनांदोलन में परिवर्तित करें, हर किसी की शक्ति को जोड़ें, हम ऐसा देश नहीं हैं कि जिसको इतना पीछे रहने की जरूरत है, हम बहुत आगे जा सकते हैं और इसलिए हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र कैसे बने, इस पर हम लोगों का कोई इंफैसिस होना चाहिए, प्रयास होना चाहिए और हम सब इसे मिलकर करेंगे, इसको किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों से कहा कि एक विद्यार्थी के नाते आपके भी बहुत सारे सपने होंगे, मैं मानता हूं कि ज़िंदगी में परिस्थितियां किसी को भी रोक नहीं पाती हैं, अगर आगे बढ़ने वालों के इरादों में दम हो तो मैं मानता हूं कि इस देश के नौजवानों में, बालकों में वो सामर्थ्‍य है, उस सामर्थ्‍य को लेकर वो आगे बढ़ सकते हैं। 
उन्होंने कहा कि टेक्‍नोलॉजी का महात्‍म्‍य बहुत बढ़ रहा है, मैं सभी शिक्षकों से आग्रह करता हूं कि कुछ अगर सीखना पड़े तो सीखें, भले ही हमारी आयु 40-45-50 पर पहुंची हो, मगर हम सीखें और हम जिन बालकों के साथ जी रहे हैं, जो कि आज टेकनोलॉजी के युग में पल रहा है, बढ़ रहा है, उसे उससे वंचित न रखें, अगर हम उसे वंचित रखेंगे तो यह बहुत बड़ा क्राइम होगा, इट्स ए सोशल क्राइम, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि आधुनिक विज्ञान, टेक्‍नोलॉजी से हमारे बालक जुड़ें, विश्‍व को उस रूप में जानने के लिए उसको वह अवसर मिलना चाहिए, यह हमारी कोशिश रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं भी आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं, जवाब देंगे आप लोग? देंगे ? अच्‍छा, आप में से कितने बालक हैं, जिनको दिन में चार बार भरपूर पसीना निकलता है शरीर से? कितने हैं? नहीं हैं ना? देखिए जीवन में खेल-कूद नहीं है तो जीवन खिलता नहीं है, ये उम्र ऐसी है, इतना दौड़ना चाहिए, इतनी मस्‍ती करनी चाहिए, इतना समय निकालना चाहिए, शरीर में कम से कम चार बार पसीना निकलना चाहिए, आप किताब, टीवी और कंप्‍यूटर, इस दायरे में ज़िंदगी नहीं दबनी चाहिए, इससे भी बहुत बड़ी दुनिया है और इसलिए ये मस्‍ती हमारे जीवन में होनी चाहिए, आप लोगों में से कितने हैं, जिनको पाठ्यक्रम के सिवाय किताबें पढ़ने का शौक हैं? चलिये बहुत अच्‍छी संख्‍या में हैं, ज्‍यादातर जीवन चरित्र पढ़ने का शौक है, ऐसे लोग कितने हैं? वो संख्‍या बहुत कम है, मेरा विद्यार्थियों से आग्रह है, जिसकी जीवनी आपको पसंद हो, उसका जीवन चरित्र आपको पढ़ना चाहिए, जीवन चरित्र पढ़ने से हम इतिहास के बहुत निकट जाते हैं, क्‍योंकि उस व्‍यक्ति के बारे में जो भी लिखा जाता है, उसके नजदीक के इतिहास को हम भलीभांति जानते हैं। 

उन्होंने कहा कि कोई जरूरी नहीं है कि एक ही प्रकार के जीवन को पढ़ें, खेल-कूद में कोई आगे बढ़ा है तो उसका जीवन चरित्र पढ़ना चाहिए, सिने जगत में किसी ने प्रगति की है, उसका जीवन पढ़ने को मिलता है तो वो पढ़ना चाहिए, व्‍यापार जगत में किसी ने प्रगति की है, उसका जीवन चरित्र मिलता है तो इसको पढ़ना चाहिए, साइंटिस्‍ट के रूप में किसी ने काम किया है तो उसका जीवन पढ़ना चाहिए, लेकिन जीवन चरित्र पढ़ने से हम इतिहास के काफी निकट और बाई एंड लार्ज सत्‍य को समझने में भी सुविधा होती है, हमारी कोशिश रहनी चाहिए, वरना आजकल तो, आप लोगों को वो आदत है, पता नहीं, हर काम गूगल गुरु करता है, कोई भी सवाल है, गूगल गुरु के पास चले जाओ, इंफोर्मेशन तो मिल जाती है, ज्ञान नहीं मिलता है, जानकारी नहीं मिलती है, इसलिए हम सब उस दिशा में प्रयास करें। विद्यार्थियों के मन में कुछ सवाल भी हैं, उनसे गप्प गोष्ठी करना मुझे अच्‍छा लगेगा, बहुत हल्‍का-फुल्‍का माहौल बना दीजिए, जरा भी गंभीर रहने की जरूरत नहीं है, आपके शिक्षक लोगों ने कहा होगा, ऐसा मत करो, यूं मत करो, ऐसे सब कहा होगा, नहीं, आपको आपके शिक्षक ने जो कहा है, यहां से जाने के बाद उसका पालन कीजिए, मगर अभी हंसते-खेलते आराम से बैठिए, हम बातें करेंगे। 







Thursday 4 September 2014

भारतीय संगीतकारों को समर्पित 8 डाक टिकट जारी

भारतीय जीवन में संगीत का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत जो कि रागों पर आधारित है, देश में लोक जीवन का आधार रहा है। फिल्मों, म्यूजिक एलबमों, लोकगीतों आदि में इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग किया गया है। यहाँ अनेक ऐसे संगीतकार हुए हैं जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे लोकप्रिय बनाया है। भारतीय डाक विभाग ने शास्त्रीय संगीत की ऐसी महान विभूतियों को डाक टिकटों पर स्थान दिया है। 

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि 3 सितम्बर 2014 को डाक विभाग ने ’’भारतीय संगीतकार’’ शीर्षक से आठ डाक टिकटों का सेट तथा एक मिनिएचर शीट जारी किया है। इनमें अली अकबर खान, भीमसेन जोशी, डीके पट्टम्माल, गंगूबाई हंगल, कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसूर, रवि शंकर और विलायत खान शामिल हैं। इनमें रवि शंकर व भीमसेन जोशी पर जारी डाक टिकट 25 रूपये मूल्यवर्ग के व अन्य पर जारी डाक टिकट 5 रूपये के हैं । भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी जी ने  इन डाक टिकटों को एक कार्यक्रम में समारोहपूर्वक जारी किया.

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इलाहाबाद परिक्षेत्र में ये डाक टिकटें इलाहाबाद प्रधान डाकघर और वाराणसी प्रधान डाकघर में स्थित फिलेटलिक ब्यूरो में उपलब्ध हैं । उन्होंने बताया कि इलाहाबाद में पहले दिन ही 25,000 से ज्यादा राशि के डाक टिकटों को लोगों ने हाथों-हाथ खरीदा। इनमें सिर्फ संगीत प्रेमी और फिलेटलिस्ट ही नहीं बल्कि स्कूली बच्चों  और युवाओं के अलावा विभिन्न कार्यक्षेत्रों में  कार्य करने वाले अधिकारी, जज, डाॅक्टर, इंजीनियर, वकील से लेकर कारपोरेट जगत से जुड़े लोग तक शामिल हैं। इनमें से कई लोग तो इन डाक टिकटों को लोगों को गिफ्ट भी कर रहे हैं। इसके अलावा इलाहाबाद फिलेटलिक ब्यूरो से नियमित रूप से जुड़े 801 फिलेटलिक डिपाजिट एकाउंट होल्डर्स को भी यह डाक टिकट व अन्य सामग्री रजिस्टर्ड डाक से भेजी जा रही है। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने यह भी जोड़ा कि वेट आॅफसेट प्रक्रिया से मुद्रित कुल 46 लाख डाक टिकट देशभर में जारी किये गये हैं।  इनमें 25 रूपये मूल्य वर्ग वाले हर डाक टिकट 8 लाख की संख्या में एवं 5 रूपये मूल्यवर्ग वाले प्रत्येक डाक टिकट 5 लाख की संख्या में मुद्रित हुए हैं। प्रथम दिवस आवरण एवं विवरणिका के साथ-साथ 4 लाख मिनीएचर शीट और प्रत्येक डाक टिकट की 1 लाख शीटलेट भी जारी की गयी हैं। 

Sunday 24 August 2014

उमेश चौहान की बाल-कविताएँ

हिंदी साहित्य में बड़ों के साथ-साथ, नन्हे-मुन्नों के लिए भी लेखन करने वालों की कमी नहीं है। बाल-साहित्य एक ऐसी विधा है, जहाँ बड़ों को भी बच्चा बनकर सोचना पड़ता है, अन्यथा लेखन में कृत्रिमता हावी हो जाती है।  उमेश चौहान जी  उन लोगों में से हैं, जो बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी बाल-कवितायेँ जहाँ बच्चों में मनोरंजन पैदा करती हैं, वहीँ उन्हें सीख भी देती हैं।  वे अपनी बाल कविताओं के बहाने कई बार अपना बचपन भी खोजते हैं। उमेश चौहान जी लेखक के साथ-साथ एक प्रशासनिक अधिकारी भी हैं।  साहित्य उन्हें संवेदनशील बनाता है और लोगों के नजदीक भी करता है।  बाल दुनिया ब्लॉग पर हम पहले भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित कर चुके हैं और अब उनकी कुछ और बाल-कविताएँ :

लालची चाचा

चाचा-चाची एक बार बाजार गए सज-धजकर
भोले-भाले चाचा पहुँचे सब्जी - मंडी भीतर।
गोल-गोल तरबूज वहाँ बिकते थे सुंदर-सुंदर
नहीं कभी देखा चाचा ने लगे परखने बढ़कर।

सब्जी वाले से चाचा ने पूछा, “यह क्या भाई?”
“हाथी का अंडा” कह करके उसने बात बनाई।
ऐसा सुनकर चाचा जी को अचरज हुआ भयंकर
खुशी-खुशी चाची से बोले, “चीज बड़ी यह सुंदर!

चलो इसे ले चलकर घर में सेवा खूब करेंगे
कुछ दिन में जब बच्चा होगा, खिला-पिला पालेंगे।
नहीं किसी के घर में ऐसा होते अब तक देखा
बड़े खुशी होंगे सब बच्चे, राजू, सनी, सुरेखा।”

सब्जी वाले ने चाचा को जमकर मूर्ख बनाया
काफी  पैसे  ले  करके पूरा तरबूज थमाया।
बोला, “चाचा! इसे राह में फटने कहीं न देना
किसी जगह पर इसे जोर से नीचे मत रख देना।”

सहमे-सहमे चाचा उसको चले हाथ में लेकर
डरते थे वह फूट न जाए कहीं जोर से दबकर।
बीच राह में बड़े जोर की प्यास लगी चाचा को
नीचे रखकर उसे मिटाने चले तुरत तृष्णा को।

पास एक झाड़ी थी जिसमें एक स्यार था रहता
चाचा के डर से वह भागा खुरखुर-गुरगुर करता।
समझा चाचा ने कि फट गया शायद उनका अंडा
भाग रहा हाथी का बच्चा, सोच उठाया डंडा।
दौड़े  चाचा उसे  पकड़ने पास  घना जंगल था
घुसे उसी में नहीं चैन अब उन्हें एक भी पल था।
खड़ी रह गईं चाची करतीं मना उन्हें जाने से
किन्तु न माने चाचा दौड़े जिद अपनी ठाने से।

जंगल में चाचा को पाकर एक भेड़िया आया
पकड़ मार डाला चाचा को पेट फाड़कर खाया।
फँसे मूर्खता में निज चाचा बुद्धि न उनको आई
झूठे लालच में फँस करके अपनी जान गँवाई।

डॉगी
मेरे घर में डॉगी है
थोड़ा-थोड़ा बागी है।

अंग्रेजी में बातें करता
हिन्दी सुनते ही गुर्राता,
दाल-पनीर देखकर बिचके
मटन-चिकन झट चट कर जाता’
पापा ने ला डाला इसके 
पट्टा एक गुलाबी है। मेरे घर में ……

मेरे संग फुटबाल खेलता
खुश हो-होकर पूँछ हिलाता,
किन्तु बड़े जोरों से भूँके
कोई अजनबी जब घर आता,
पूर्व परिचितों के प्रति लेकिन
यह असीम अनुरागी है। मेरे घर में ……

नाम रखा है ‘बूजो’ इसका
संकर नस्ल रंग भूरा सा,
घर की रखवाली में तत्पर
हल्की आहट सुन उठ जाता,
आया जब से है यह घर में
बिल्ली घर से भागी है। मेरे घर में ……



मस्ती

 काले-काले बादल छाए
पुरवाई संग उड़कर आए।

जमकर बरसे मेघ सलोने
भीगे धरती के सब कोने।
रिंकू ने भी शर्ट उतारी
भीग-भीग किलकारी मारी।
सिम्मी, निम्मी, रिंकी, अख़्तर
जुटे सभी पल भर में छत पर।
दौड़-दौड़ सारे बच्चों ने
मस्ती के परचम लहराए। काले-काले बादल ……

खेल-खेल में ही रिंकू ने
अख़्तर को थोड़ा धकियाया।
छत की रेलिंग पर लटका था
अख़्तर खुद से संभल न पाय।
नीचे जाकर गिरा जोर से
गिरते ही फिर होश न आया।
भागे सारे बच्चे नीचे
मम्मी-पापा भी घबराए। काले-काले बादल ……

अस्पताल ले जा अख़्तर को
डॉक्टर से उपचार कराया।
चोट नहीं गहरी थी उसकी
होश तभी अख़्तर को आया।
बहुत सभी पछताए बच्चे
पापा-मम्मी ने समझाया।
मस्ती बहुत जरूरी होती

लेकिन सबकी हैं सीमाएं। काले-काले बादल ……

अनमोल खजाना

दीपक बड़ा दुलारा था
दादा जी को प्यारा था,
पापा दूर शहर में रहते
सबका वही सहारा था।

दादा जी बिलकुल बूढ़े थे
वे घंटों पूजा करते थे,
खर्चे-पानी से जो बचता
एक तिजोरी में रखते थे।

उसे खोलना और बंद
करना दीपक को भाता था,
बेहिसाब रखवाली का वह
पूरा लाभ उठाता था।

रोज सुबह चुपके उससे वह
रुपए बीस चुराता था,
विद्यालय के इंटरवल में
चाट-पकोड़े खाता था।

खिला-पिलाकर उसने अपने
साथी खूब बनाए थे,
उनके संग ही आता-जाता
असल दोस्त कतराए थे।

दादा कभी भाँप ना पाए
थे दीपक की चालाकी,
जब-जब वे बीमार पड़े
उसने ही उनकी सेवा की।
लेकिन चमत्कार होते हैं
कभी-कभी कुछ जीवन में,
महा-चरित्रों से मिलती है
सीख अनोखी बचपन में।

उस दिन टीचर ने कक्षा में
भावुक  हो  समझाया  था,
गाँधी जी की आत्म-कथा का
हिस्सा  एक  सुनाया  था।

गाँधी जी ने भी बचपन में
घर  के  द्रव्य चुराए  थे,
किन्तु बाद में पछताकर
बीमार पिता ढिग आए थे।

सच-सच लिखकर बता दिया
चिपटे फिर जोर-जोर  रोए,
आगे अपने कर्म-क्षेत्र में
बीज  सत्य  के  ही  बोए।

पढ़ते ही यह पाठ अचानक
दीपक का मन भर आया,
लौट शाम को घर पर उसने
दादा  को  सच  बतलाया।

फूट-फूटकर दीपक रोया
दादा से माफी माँगी,
चोरी-झूठ त्यागकर उसमें
सच के प्रति निष्ठा जागी।

दादा जी ने विह्वल होकर
उसे  प्यार  से  दुलराया,
थमा तिजोरी की चाभी फिर
बड़ा  मनोबल  उकसाया।

एक पाठ की एक सीख ने
दीपक का जीवन बदला,
शिक्षा का अनमोल खजाना
करता सबका सदा भला।

-उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223).

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)